कहाँ ताल्लुक था, कहाँ वो निस्बत थी,
ये राज़ भी वक़्त की तहों में रहा।
एक नाम था, एक ख़याल था शायद,
जो दिल के किसी कोने में ठहरा रहा।
तस्वीर जो आई निगाहों के सामने,
उसमें भी ख़ामोश एक फ़साना था।
न कोई ज़िक्र-ए-वफ़ा लिखा था,
न कोई अफ़साना पुराना था।
न खूबियों का कोई तज़किरा मिला,
न कमियों का कोई निशाँ मिला।
बस एक अक्स था धुँधला-सा,
जिसमें गुज़रा हुआ एक जहाँ मिला।
किसी ताल्लुक़ की वो कैसी कहानी थी,
जिसका कोई उन्वान नहीं मिला।
कुछ रिश्ते फ़क़त एहसास होते हैं,
जिनका कोई बयान नहीं मिला।
वो कौन था, कहाँ का मुसाफ़िर था,
ये सवाल दिल में रह गया।
तस्वीर तो सामने थी मगर,
हर एक राज़ पर्दे में रह गया।
— [साक्षी यादव]