' दो शहरों के बीच धड़कता एक घर '
बीजापुर की धरती पर
तुम ज्ञान के दीप जलाते हो,
बालोद की कक्षाओं में
मैं भी भविष्य के स्वप्न सजाती हूँ।
तुम्हारे पास विद्यार्थियों का संसार,
मेरे पास बच्चों की किलकारी है,
तुम कर्तव्यों में व्यस्त वहाँ,
यहाँ जीवन की पूरी जिम्मेदारी है।
हम दोनों शब्दों के साधक हैं,
दोनों का अपना कर्मक्षेत्र,
पर एक ही घर के सपनों के बीच
क्यों खिंच गया दूरी का क्षेत्र?
तुम्हें शायद मालूम है,
मैं दिनभर मुस्कुराती हूँ,
महाविद्यालय में पढ़ाती हूँ,
घर लौटकर माँ बन जाती हूँ।
बेटे की पढ़ाई, बेटी के सपने,
उनकी छोटी-बड़ी फरमाइशें,
कभी गृहकार्य, कभी उनकी शरारतें,
कभी मनुहारें, कभी शिकायतें।
इन सबके बीच न जाने कब
अपनी थकान भुला देती हूँ,
दो नन्हें चेहरों की मुस्कान के लिए
अपनी उदासी छिपा लेती हूँ।
जब बेटा पूछता है—
"पापा कब घर आएँगे मम्मा?"
तो मेरे अधरों पर मुस्कान रहती है,
पर मन में उतर आती है एक शाम।
जब बेटी अपनी बातें लेकर
मेरे पास सिमटकर बैठ जाती है,
तब लगता है, मेरे भीतर की स्त्री
कुछ पल को फिर माँ बन जाती है।
उन्हें क्या बताऊँ कि उनकी माँ
हर दिन कितने हिस्सों में बँटती है,
एक हिस्सा कक्षा में पढ़ाता है,
दूसरा बच्चों के संग चलता है,
और जो थोड़ा-सा शेष बचता है,
वह तुम्हारी याद में ढलता है।
कभी रसोई की आँच के बीच
तुम्हारी आवाज़ याद आती है,
कभी बच्चों को सुलाते-सुलाते
अपनी आँख भी भर आती है।
कितना कठिन है यह जीवन—
जब मन चाहे कोई साथ रहे,
दिन की थकान बाँटने वाला
सिरहाने कोई हाथ रहे।
तुम्हारे दिन की कठिनाइयाँ
मैं समझने का प्रयास करती हूँ,
तुम भी तो अपने कर्तव्य के लिए
अपनों से दूर रहते हो।
तुम्हारी विवशता पर प्रश्न नहीं,
न तुम्हारे प्रेम पर संदेह है,
बस कभी-कभी इस अकेलेपन से
मन का मौन संवाद है।
मैं नहीं चाहती कि तुम लौटकर
अपने कर्तव्य से मुँह मोड़ो,
बस इतना चाहती हूँ कि कभी
मेरी थकान को भी पढ़ लो।
मैं भी इंसान हूँ, प्रिय,
मेरे भीतर भी भावनाएँ हैं,
मैं भी कभी सहारा चाहूँ,
मेरी भी कुछ सीमाएँ हैं।
मुझे केवल माँ मत समझना,
मैं तुम्हारी जीवनसंगिनी भी हूँ,
बच्चों की दुनिया सँभालने वाली
एक स्त्री ही नहीं,
अपनी पहचान गढ़ती प्राध्यापिका भी हूँ।
मेरी कलम में जो पीड़ा है,
वह केवल विरह की कहानी नहीं,
यह उस स्त्री का मौन इतिहास है
जिसकी मेहनत की कोई गिनती नहीं।
मेरे बेटे की आँखों में
जब भविष्य चमकता है,
मेरी बेटी के सपनों में
जब नया आकाश दमकता है,
तब लगता है, मेरी सारी मेहनत
एक सुंदर अर्थ में बदल जाती है।
मैं उन्हें संस्कार सिखाती हूँ,
तुम्हारे स्नेह का अर्थ बताती हूँ,
तुम दूर हो, पर उनके जीवन में
तुम्हारी उपस्थिति बनाए रखती हूँ।
हम दोनों मिलकर माता-पिता हैं,
भले अलग-अलग नगरों में रहते हैं,
दोनों बच्चों के उज्ज्वल कल के लिए
अपने वर्तमान को सहते हैं।
फिर भी मन में एक आकांक्षा है—
कब वह दिन भी आएगा,
जब सुबह बच्चों की हँसी के संग
तुम्हारा चेहरा दिखाई देगा?
जब विद्यालय और महाविद्यालय के
किस्से एक साथ सुनाए जाएँगे,
जब दिनभर की सारी थकान के बाद
हम कुछ पल अपने लिए पाएँगे।
न बीजापुर दूर लगेगा,
न बालोद कोई सीमा होगी,
बच्चों के सिर पर दोनों का हाथ,
और घर में खुशियों की रौनक होगी।
तब शायद मैं अपनी डायरी में
एक नई कविता लिख पाऊँगी,
जिसमें विरह नहीं, प्रतीक्षा नहीं,
केवल साथ होने की खुशी सजाऊँगी।
मैं एक माँ हूँ—
अपने बच्चों का वर्तमान सँवारती हूँ।
मैं एक प्राध्यापिका हूँ—
विद्यार्थियों का भविष्य निखारती हूँ।
मैं एक पत्नी हूँ—
दूरी में भी प्रेम निभाती हूँ।
और मैं एक स्त्री हूँ—
अपने मौन को शब्द बनाकर
अपनी पहचान रचती जाती हूँ।
प्रिय, हमारी दूरी को
मेरी नियति का नाम मत देना,
मेरे संघर्ष को केवल कर्तव्य समझकर
उसमें छिपा प्रेम कभी कम मत आँकना।
मैं चाहती हूँ कि हमारा बेटा
संवेदनशील मनुष्य बने,
हमारी बेटी अपने सपनों के लिए
आत्मविश्वास से आगे बढ़े।
और जब वे बड़े होकर पूछें—
"माँ, तुमने यह सब कैसे किया?"
तो मैं मुस्कुराकर कह सकूँ—
"मैंने अकेले सब सँभाला जरूर,
पर तुम्हारे पिता के साथ
हमारे परिवार का सपना जिया।"
क्योंकि हमारा प्रेम
केवल साथ बिताए पलों का नाम नहीं,
यह दो शहरों में रहकर भी
एक परिवार को थामे रखने का विश्वास है।
तुम बीजापुर में अपना दायित्व निभाना,
मैं बालोद में बच्चों को सँभालूँगी,
पर इस जीवन की अनकही पीड़ा को
मैं अपनी कविता में ढालूँगी।
दो नगर हैं, दो कार्यस्थल हैं,
दो बच्चों का संसार है,
एक माँ का संघर्ष है,
एक पिता का दायित्व है,
और इन सबके बीच
हमारे प्रेम का विस्तार है।
हम दूर जरूर हैं, प्रिय,
पर हमारा परिवार अधूरा नहीं—
बस एक छत के नीचे जीने का
हमारा सपना अभी पूरा नहीं।
-रम्भा रत्नाकर बांधे