आ रही हैं, दीवाली, अब परिन्दा नहीं रहेगा
रहने वाले अपने शहर में।।
परिंदा उड़ जाएगा , अब अपने गांव
मोह मुग्ध होकर , आयेगा फिर से , अश्रु से sarabhor होकर ।।
आ रही है दीवाली,परिंदा हो गया है अब फरार ।।
मां उसकी बैठी थी आश लगाए ,आयेगा परिंदा दिवाली में ।।
जाऊंगा अपने घर घूमूंगा गांव पूरा , लगाऊंगा सैर
मिलूंगा अपने काका से , दादा। से देख के एक बार सब को ।।
जैसे आई मिलने की , मां की बारी स्वप्न स्वप्न ही रह गया
खुल गई आँख , टूट गया सपना , उठ जा ये परिंदा जा अपने कम को ।।
फिर आया मन में , काश ये सपना सपना न होता ,
तो मै , नीद में भी परिंदा न होता ।।
-रवि सिंह