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दर्पण पर कविता

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                            अपने आप में अदभुद और निराला है दर्पण,
        
                                                    
                            
इंसान की परछाई है दर्पण,
इंसान का अभिमान है दर्पण,
इंसान जब रोता है तब दर्पण भी रोता है,
इंसान जब हंसता है तब दर्पण भी हंसता है,
सच - झूठ की राह में साथ निभाता है दर्पण,
इंसान जो देखना चाहता है वही दिखाता है दर्पण,
सुनो जनाब, दर्पण एक मात्र काँच का टुकड़ा है,
असली दर्पण हमारी आँखें है साहब,
जो हमे हमारे असली रूप से रूबरू करवाता है।
- आकांक्षा गुप्ता
एक महीने पहले
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