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बस एक भूल याद रही

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बस एक भूल याद रही
        
                                                    
                            

रण में जब संकट गहराया,
दशरथ का रथ डगमगाया,
धुरी सँभाली हाथों से तब,
मृत्यु से राजा लौट के आया।
वीरांगना के उस साहस की,
अवधपुरी को याद रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

दो वर राजा ने दे डाले,
कैकेयी ने फिर भी टाले,
चाहती तो उस दिन माँगती,
राजमुकुट, वैभव के प्याले।
वर से बढ़कर प्रेम था तब तक,
मन में यही बुनियाद रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

राम कहाँ भरत से कम थे,
चारों पुत्र हृदय के सम थे,
राम स्वयं भी माँ कहते थे,
उसके स्नेह में कब भ्रम थे।
ममता के उस निर्मल मन में,
राम-स्नेह की धार रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

एक रात मंथरा ने आकर,
शब्द रखे अंगारे लाकर,
“राम बने राजा तो सोचो—
भरत रहेंगे कहाँ, बताकर?”
कानों में संदेह उतरता,
मन में एक विष-बात रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

कोपभवन, दो वर, इक निर्णय,
और बदलता गया भविष्य,
एक तरफ़ भरत का सिंहासन,
एक तरफ़ वन जाते रघुवर।
शब्द निकलकर लौट न पाए,
आँखों में फरियाद रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

राम खड़े थे शांत सामने,
रोष नहीं था उनके मन में,
“माँ की इच्छा”—कह स्वीकारा,
चल दिए वन उसी क्षण में।
जिसने वन का वचन दिया था,
वही देखती राह रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

वही दशरथ, जिनके जीवन को,
उसने रण में कभी बचाया,
राम-वियोग न सह पाए वे,
प्राणों ने फिर साथ छुड़ाया।
सूना कक्ष, बुझा सिंहासन,
बस स्मृतियों की रात रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

भरत लौटे, सत्य को जाना,
राज्य नहीं, वनवास को माना,
जिस पुत्र के हित वर माँगे थे,
उसने भी वह राज्य न माना।
राज मिला न पुत्र मिला फिर,
माँ की सूनी गोद रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

राजमहल था, राज नहीं था,
जीवन में अब साज नहीं था,
पति नहीं, प्रिय पुत्र नहीं थे,
मन में कोई आज नहीं था।
भीड़ भरे उस राजभवन में,
वह खुद से संवाद रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

चौदह वर्ष, चौदह सावन,
चौदह दीप जले बिन आँगन,
हर आहट पर लगा कि शायद,
राम लौट आएँगे इस क्षण।
द्वार निहारे आँखें थकतीं,
मन में बस फरियाद रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

दीप जले जब राम पधारे,
हर्ष उमड़ आया द्वारे-द्वारे,
एक हृदय पर बोझ अभी था,
कैसे देखे राम को प्यारे?
आँख झुकी थी अपराधों से,
मन में कैसी रात रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

वही राम फिर पास में आए,
माँ कहकर सम्मान जताए,
जिसको जग ने दोषी माना,
उसको पुत्र ने गले लगाया।
जग के सारे प्रश्नों से ऊपर,
राम की ममता साथ रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

एक भूल थी—भूल बड़ी थी,
उसकी कीमत और बड़ी थी,
पति खोया, सम्मान भी खोया,
ममता अपनी मौन खड़ी थी।
दंड किसी ने और न माँगा,
मन ही उसका घात रही—
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥

मत जीवन को क्षण में तौलो,
एक पृष्ठ से ग्रंथ न खोलो,
गिरना मानव की सीमा है,
पश्चात्ताप को भी तो बोलो।
जिसने जीवन भर दुख ढोया,
क्या बस उसकी भूल रही?
सारे पुण्य भुला दिए जग ने,
बस एक भूल ही याद रही॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
एक घंटा पहले
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