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आईना बूढ़ा नहीं होता

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                            आईना बूढ़ा नहीं होता
        
                                                    
                            

आईना
बूढ़ा नहीं होता।

वही चमक,
वही साफ़ नज़र—
बूढ़े तो
उसके सामने खड़े
चेहरे होते हैं।

कल तक
वह मुझे देखकर
मुसकराता था।

आज
मेरी मुसकान में
किसी पुराने चेहरे को
तलाशता है।

बालों में चाँदी,
माथे पर रेखाएँ,
आँखों के नीचे
कुछ अधूरी रातें—

आईना
सब गिनता है,
पर कुछ कहता नहीं।

कभी इसी चेहरे पर
माँ काजल लगाती थी।

पिता कहते थे—
“मेरा बेटा
बहुत आगे जाएगा।”

आज वही बेटा
आईने के सामने
बाल सँवारते हुए
अपना बीता समय
सँवारता है।

दीवारें नई हो गईं,
कमरा बदल गया,
शहर भी बदल गया—

पर आईने में
माँ का आँचल
आज भी हिलता है।

चेहरे पर
जो रेखाएँ उभरी हैं,
वे केवल उम्र नहीं—

कुछ बच्चों की चिन्ता हैं,
कुछ रिश्तों की कीमत,
कुछ सपनों की किश्तें,
कुछ अपनों की दूरी।

हर रेखा
एक कहानी है।

हर सफेदी
किसी तपते दिन की
गवाही है।

दुनिया कहती है—
“तुम बदल गए।”

आईना जानता है—
मैं बदल नहीं गया,
बस सबको सँभालते-सँभालते
थोड़ा थक गया हूँ।

तस्वीरें
पुरानी हो जाती हैं।

चेहरे
धुँधले पड़ जाते हैं।

यादें भी
कभी-कभी
नाम भूल जाती हैं—

पर आईना
हर सुबह
मेरा आज लौटा देता है।

वह झूठी तसल्ली
नहीं देता।

वह यह भी नहीं कहता
कि समय रुक जाएगा।

बस चुपचाप पूछता है—

“चेहरा तो
बहुत जी चुका—

क्या तुम्हारे भीतर का आदमी
अब भी जीवित है?”

मैं आँखों में
थोड़ा गहरा उतरता हूँ।

वहाँ आज भी
एक बच्चा बैठा है—

हाथ में पतंग,
मन में आकाश,
और आँखों में
कल का विश्वास।

तब समझ आता है—

झुर्रियाँ
चेहरे पर आती हैं,
सपनों पर नहीं।

देह थकती है,
उम्मीद नहीं।

उम्र बढ़ती है,
मन नहीं—

क्योंकि
आईना बूढ़ा नहीं होता,

वह केवल
हर बीतते वर्ष के साथ
हमारे भीतर छिपा
असली चेहरा
दिखाता है।

और जिस दिन
हम स्वयं को पहचान लें—

उस दिन आईना नहीं,
हमारा भ्रम
टूटता है॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
12 घंटे पहले
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