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अधूरी सी बातें

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी–कभी दिल में इतना भर जाता है,
        
                                                    
                            
कि हर एहसास भीतर ही मर जाता है।
न आँसू गिरते हैं, न शब्द निकल पाते हैं,
बस ख़ामोशियाँ सीने में घर बना लेती हैं।

दिन भर हँसी का चेहरा सजाए रहते हैं,
भीड़ में रहकर भी खुद से पराए रहते हैं।
रात ढले जब सन्नाटा पास आता है,
हर दबा हुआ दर्द फिर जाग जाता है।

लोग कहते हैं — “तुम बहुत मज़बूत हो”,
काश समझ पाते ये भी एक बोझ होता है।
मज़बूती कोई नेमत नहीं होती,
यह तो टूटकर भी न रोने की आदत होती।

कुछ घाव शब्दों से नहीं भरते,
वे हर धड़कन के साथ और गहरे उतरते।
सीने में चुभती रहती हैं अधूरी सी बातें,
जैसे बंद कमरे में भटकती हों रातें।

हम मुस्कुराते हैं ताकि सवाल न उठें,
क्योंकि हर “क्या हुआ?” से ज़ख्म फिर खुलें।
आईना भी अब अजनबी सा लगता है,
चेहरा अपना होकर भी पराया सा लगता है।

दिल में जमा दर्द जब भारी हो जाता है,
तो इंसान खुद से ही हारा हो जाता है।
हर रोज़ भीतर एक तूफ़ान मरता है,
और बाहर का चेहरा बस चुप रहता है।

काश कोई ख़ामोशी पढ़ पाता,
बिना पूछे बस पास आ जाता।
धीरे से कह देता — “मैं हूँ ना…”
तो शायद यह दिल थोड़ा कम टूटता।
-सुजल गुप्ता 'नकारा'
3 महीने पहले
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