बीत गए सब सावन-भादों,
सूख गई मन की अमराई।
आहट-आहट चौंक उठा मन,
जब-जब द्वार हवा टकराई।
कागज़ पर जो आँसू छलके,
अक्षर-अक्षर बहते देखे।
सपनों के जो महल चुने थे,
तिनके-तिनके ढहते देखे।
एक दिया जो जला मुंडेर पर,
वो भी अब बुझने आया है।
आस लिए जो बैठी आँखें,
उनके हिस्से अँधियारा आया है!
तुम तो चले गए राहों में,
पीछे अपनी याद दिए।
जीवन भर जो बहना सीखे,
अँखियों को वो धार दिए।
बीत गए सब सावन- भादों,
सूख गई मन की अमराई।
आहट - आहट चौंक उठा मन,
जब - जब द्वार हवा टकराई।।।
- राकेश कुमार तिवारी