अधूरा ख़त
इतनी भावनाएँ हैं
कि शब्द उनका भार नहीं सँभाल पाते।
लिखने बैठूँ,
तो एक पूरी किताब जन्म ले लेती है।
पर लिखना है—
बस एक ख़त।
कैसे उतार दूँ
एक समंदर को
स्याही की एक बूँद में?
हर बार क़लम उँगलियों तक आती है,
मगर दिल तक पहुँचते-पहुँचते
उसकी नोक काँपने लगती है।
सोचता हूँ—
आज हर जज़्बात को
तहरीर का रूप दे दूँ;
पर हर बार
कुछ लफ़्ज़ काग़ज़ पर उतरते हैं,
और शेष
ख़ामोशियों में ठहर जाते हैं।
शायद
एहसासों की कोई सरहद नहीं होती।
उन्हें हर्फ़ों के दायरों में
क़ैद नहीं किया जा सकता।
जो लिख दिया,
वह महज़ एक संकेत है।
जो अनलिखा रह गया,
वही मेरा सच है।
मेरे इस ख़त को
अल्फ़ाज़ों से मत पढ़ना,
उसकी ख़ामोश जगहों में उतरना।
वहीं मेरी रूह
तुम्हारा इंतज़ार करती मिलेगी।
अगर कभी
तुम्हें पन्नों के बीच
एक भीगा हुआ सन्नाटा मिले,
समझ लेना—
वह मेरी आँख का नहीं,
मेरे हृदय का आँसू है।
जब तुम्हें लगे
कि अब सब पढ़ लिया है,
तब एक बार फिर
पहले पन्ने पर लौट आना...
शायद तब
तुम उन शब्दों को भी पढ़ सकोगे,
जो कभी लिखे ही नहीं गए।
क्योंकि—
यह अब भी अधूरा है ख़त।
-भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित 'भुवन'