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अभिमन्यु — चक्रव्यूह से बड़ा साहस

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                            अभिमन्यु — चक्रव्यूह से बड़ा साहस
        
                                                    
                            

माँ सुभद्रा के गर्भ में ही,
रण का पहला ज्ञान सुना।
चक्रव्यूह में प्रवेश समझकर,
जीवन ने पहला पाठ बुना॥

उम्र अभी थी फूल सरीखी,
पर मन में था तेज अपार।
अर्जुन का था रक्त रगों में,
कृष्ण-कुल के उच्च विचार॥

अर्जुन दूर गए रण से जब,
संकट बनकर व्यूह खड़ा।
अनुभव वाले मौन खड़े थे,
एक किशोर तब आगे बढ़ा॥

प्रश्न खड़ा था—कौन बढ़े अब?
कौन बने सेना की ढाल?
अभिमन्यु ने भार उठाया—
उम्र न पूछे कभी सवाल॥

राह पता थी भीतर जाने की,
लौट सकूँगा—ज्ञान नहीं।
फिर भी पग पीछे न मोड़े,
कर्तव्य से बढ़कर प्राण नहीं॥

चक्रव्यूह का द्वार खुला तो,
वीर अकेला बढ़ता गया।
कौरव-दल की भीड़ चीरकर,
अपना पथ वह गढ़ता गया॥

पीछे अपने छूट गए जब,
सम्मुख थे योद्धा अपार।
साथ छूटा, साहस न छूटा,
वह खुद अपनी बना दीवार॥

कौरव दल के महारथियों ने,
रण की मर्यादा बिसराई।
एक अकेले वीर को घेरा,
संख्या ने सामर्थ्य दिखलाई॥

रथ टूटा, फिर धनुष भी टूटा,
हाथों से हथियार गए।
साधन सारे छीन लिए पर,
मन के कहाँ विचार गए?॥

जीवन उसका छीन लिया पर,
कौन मिटाता वीर निशान?
देह भले रणभूमि में सोई,
युग ने गाया उसका गान॥

अभिमन्यु यह सीख दे गया—
उम्र नहीं पहचान बनाती।
जब जिम्मेदारी सामने हो,
हिम्मत अपना कद दिखलाती॥

पूरा ज्ञान मिले तब चलना—
जीवन का दस्तूर नहीं।
जितना जाना, श्रेष्ठ करो तुम,
रुक जाना मंज़ूर नहीं॥

चक्रव्यूह तो आज भी हैं,
बस उनके आकार नए।
कर्तव्य, संकट, कठिन फैसले—
हर युग में किरदार नए॥

जीत हमेशा लौट आने का,
केवल एक प्रमाण नहीं।
सत्य हेतु जो डटकर लड़ ले,
उससे बढ़कर मान नहीं॥

राह कठिन थी, साथ न था पर,
उसने अपना धर्म निभाया।
चक्रव्यूह से बड़ा था साहस—
अभिमन्यु अमर कहलाया॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
एक महीने पहले
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