"ए स्त्री! तू क्यों बलिदान की मूरत बांटी जाती है,
तू क्यों पीछे रहकर सबको ऊंचा उठाती जाती है ,
ए स्त्री !,तू क्यों खुद अपनी स्थिति दयानी बनती जाती है,
ए स्त्री ! तू क्यों बलिदान की मूरत बांटी जाती है ,
क्या तेरे बलिदान को यह दुनिया तुझे गिनती है,
ए स्त्री ! तू क्यों पीछे रहकर सबको आगे करती जाती है
ए स्त्री! तू क्यों सबका मन रख कर,
खुद के मन में सिर्फ अफसोस करती जाती है!
ए स्त्री !तू क्यों बलिदान की मूरत बांटी जाती है
कभी खुद को निहार ,कभी खुद को तरास ,खुद के लिए जी, खुद पर भरोसा रख ,तेरे बलिदान को यह दुनिया कब का भूल जाती है,
तेरे बलिदान को क्या यह जग तुझे गिनती है ,
ए स्त्री! क्यों बलिदान की मूरत बनतीजाती है!!"