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तुम कौन हो

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरे हृदय में जो दीप की तरह प्रज्वलित होते।
        
                                                    
                            
तुम कौन हो साँसों में बिना रोकटोक विचरते।।

एकान्त में क्या भीड़ में केवल तुम्हीं को समझा।
ज्यों अनहद के सुदूर आकाश में नाद से बजते।।

भूलें कैसे उस छवि को जो प्राणवायु सी बहती।
तुम्हारी स्मृतियों के प्रभाव वातावरण में बजते।।

अब न मिलन की प्यास न शेष रही अभिलाषा।
अंतस पटल पर आलौकिक प्रेम की तरह बजते।।

तुमने कभी संशय न सौपा न अधरों पर ही लाए।
तुमने संताप दिया 'उपदेश' श्याम स्पन्दन बजते।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
2 महीने पहले
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