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रुढियों की हथकड़ी

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज भी मन में पीड़ा ठहरी हुई है।
        
                                                    
                            
उससे दिल लगाया वो शहरी हुई है।।

वे चित्र आँखों में बसे जाते ही नही।
अधूरा छोड़कर गई रूह पहरी हुई है।।

बुझ गया दीपक हकीकत चाँदनी में।
अंदर में प्यारी छवि और गहरी हुई है।।

याद आता साँझ को भूगोल उसका।
प्रभाव के इतिहास की गठरी हुई है।।

आज भी सपनों जड़ी जयमाला पहने।
नही मिलने जैसी रेल की पटरी हुई है।।

रुढियों की हथकड़ी 'उपदेश' है कड़ी।
मन के मौला की साँस भी ठहरी हुई है।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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