पुरुष कैसा भी हो पर प्रेम नही समझता।
उसके व्यवहार में उतावलापन झलकता।।
माना वह समझदार और परिपकव होता।
फिर भी स्त्री की अंतरात्मा नही समझता।।
प्रेम में डूबी स्त्री फिर से बच्ची बनना चाहे।
ऐसी मनोदशा कामी पुरुष नही समझता।।
जबकि स्त्री प्रेम में खोई हुई दुनियां ढूंढती।
पुरुष व्यथित करता 'उपदेश' नही समझता।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'