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प्रेम ही रहे अनंत

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            प्रतीक्षा का पल-पल पूर्ण होते दिख जाए।
        
                                                    
                            
फिर नजरों का दीपक खुशी से जगमगाए।।

तब न आरंभ हो न अंत प्रेम ही रहे अनंत।
हर एक अक्षर थमकर वहाँ मौन बन जाए।।

तब तुम और मैं नही बस हम परिभाषा हो।
ऐसे मौन में ही हमारी आत्मा एक हो जाए।।

फिर जरूरत नही बार-बार चेहरा पढ़ने की।
मौन में चाँदनी का रंग अनायास चढ जाए।।

आगोश में लेकर मदहोशी से सराबोर जिस्म।
सारी खुशियाँ समेटकर आँचल खिल जाए।।

मन ही मन से पूछे कौन किसको पिरो रहा।
मिलन की इस घड़ी में 'उपदेश' गुम हो जाए।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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