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पेड़ की तरह खड़ा

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पेड़ की तरह खड़ा हूँ देखता आसमान में।
        
                                                    
                            
काट रहे जो मुझको अपनी धुन और शान में।।

पत्ते भी साथ छोड़ गए चिडियों की तरह से।
वियोग में जी रहा हूँ जाने किसके सम्मान में।।

क्या कुछ नही दिया परोपकार के नाम पर।
अपना उपकार भूल गया आन वान शान में।।

चाहते व्यथित होकर अधूरी सी लगने लगी।
सब को अपना समझा भविष्य के ध्यान में।।

इंसानियत दरकिनार कर 'उपदेश' विकास धुन।
विनाश की लीला रच रहे जाने किसके मान में।।

कुछ दिन का मेहमान क्या यही होता विधान।
परवरिश की भीख माँगता खुले आसमान में।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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