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तन में प्रेम का स्रोत जम गया हो जैसे।

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्या देह की सीमा उसकी काफी थी?
        
                                                    
                            
मूक संवाद करती अर्थ नही साध्वी थी।।

तन में प्रेम का स्रोत जम गया हो जैसे।
चेतना की हर साँस उसकी प्यासी थी।।

आत्मा की गहराईयों में मिलन करती।
स्वप्नों में खामोशी की सच्ची साथी थी।।

आकर्षण का जादू आज भी कायम।
दिल की धड़कनो में मथुरा-काशी थी।।

बहती नदी किनारे छूती रहती 'उपदेश'।
मन की सरहदों के अन्दर काफी थी।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
2 महीने पहले
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