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मोहब्बत अब भी

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सरेआम तारीफ़ करने के दिन जाते रहे।
        
                                                    
                            
मोहब्बत अब भी मगर फूल चिढ़ाते रहे।।

जिक्र लिखकर ग़ज़ल में लाइने पूरी करें।
हौसले उसने बढ़ाए रिश्ते आजमाते रहे।।

पता जब मुझको चला तब देर हो चुकी।
मगर उसकी हिम्मत को सदा सराहते रहे।।

फिसलने का वक्त उसकी मेहरबानी रही।
डर इतना ज्यादा कि 'उपदेश' घबराते रहे।।

मन मुताबिक संकल्प लिया और रुक गए।
उसकी छत पर उसका झंडा फहराते रहे।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
2 महीने पहले
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