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मेरे ख्वाब

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दर्द के साथ भी हँसते बिलखते देखे।
        
                                                    
                            
ज़ख्म धीरे ही सही मगर भरते देखे।।

रास्ता आज भी रोक लेती उलझने।
कोई पूछे तो सब ठीक है कहते देखे।।

आसमान से उतरते रहते मेरे ख्वाब।
भरी दोपहर में पेड़ के नीचे सोते देखे।।

सिर छुपाने को मिली नही छत तक।
बेबस रोटी के लिए 'उपदेश' रोते देखे।।

सिर्फ नारों में सपना बेच रहे झूठे लोग।
हकीकत में देश की गरीबी बढ़ाते देखे।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
3 महीने पहले
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