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मैंने चाहा प्यार

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैंने चाहा प्यार, हो गई आँखें स्याही
        
                                                    
                            
पता नही था, हिस्से में अजनबी राही
कौन बुझायेगा तपते होंठों की प्यास
गुमसुम रातों में व्याकुलता रही साही

एक खुशी की मन्नत मांगी ईष्ट देव से
दयालू होंठ ना मुस्काये की कार्य वाई
पीड़ा बढ़ती रही साथ आये कोई मेरा
ये सोचते आँख लगी, उदासी घबराई

कलम उँगलियों के बीच कशमकश में
लिखता दीप जलाओ मनाओ दीवाली
याचक बनना छोड़ो कर्म करो 'उपदेश'
हर चेहरे पर व्याप्त मिलेगी गहरी लाली
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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