लड़की पैदा होने की खुशी में माँ इतराई।
वो भी किसी माँ-बाप की दुआओ से आई।।
बचपन में खेल निराले उनके माने न जाने।
दर्द के आलम में पली मासूमियत मुस्काई।।
सीमित सपनों का संसार पंखों से प्यार है।
जैसे जैसे शिक्षित हुई पाखंड को तोड़ पाई।।
प्यार की अहमियत समझने लगी थी वो।
सम्मान के समागम से घर में स्वर्ग बना पाई।।
रिश्तों की खुशबू भिन्न-भिन्न जरूर होती।
सुख समृद्धि 'उपदेश' से यों रूबरू करवाई।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'