एक निगाह ने गुनाह छिपा लिया।
बात पलटकर मुझसे वादा किया।।
खुशी की शाम ढल जाए न कहीं।
इसलिए मुस्कराने का इरादा किया।।
मंज़िल करीब जानकर हैरानी हुई।
फिर ठेला-ठाली कुछ ज्यादा किया।।
अब न सहना पड़ेगा अकेलापन मुझे।
ऐसा सोचते ही उसने संजीदा किया।।
तबाही के रास्ते पर ना जा 'उपदेश'।
बहलाते हुए इशारों में सजदा किया।।
मेरी कहानी में गवाह वो अकेले रही।
खुद-कुशी से निकाल शर्मिंदा किया।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'