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खामोशी में विदाई के दर्द चुभते

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खामोशी में भी विदाई के दर्द चुभते है।
        
                                                    
                            
ऐसे जिस्म को कफन के लिबास फबते है।।

सजाओ डोली को विदाई का मुहूर्त आया।
न रोको उन्हें अब उनको अदावत चुभते है।।

विदाई की रीति न जाने कब से चली आई।
श्मशान उनकी मंजिल आत्मसात चुभते है।।

कंधों पर उठाओ उनके पाँव बोझिल हुए।
आँसू न बहाना 'उपदेश' जज्बात चुभते है।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
14 घंटे पहले
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