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काट रहे जड़े

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिखते देश के संग मगर काट रहे जड़े।
        
                                                    
                            
ऐसे छोटों की जिन्दगी बना रहे है बड़े।।

जन भावना के खिलाफ काम कर रहे।
हर एक विधान में ऐसे होते रहे है बड़े।।

चढ़कर किसी के धन पर पाए मुक़ाम।
क़ाबिल किसी भी तरह नही रहे है बड़े।।

कैसे गटक गए सब के हिस्से की खुशी।
बातों से नदी की सफाई कर रहे है बड़े।।

निकलेंगे उल्टे मायने उनकी गवाही के।
'उपदेश' दे दे कर बेशरम हो रहे है बड़े।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
3 महीने पहले
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