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कशमकश की जिन्दगी

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कशमकश की जिन्दगी तन्हाई से जूझती।
        
                                                    
                            
कल तक पूछती रही वह अब नही पूछती।।

थाम कर एक सिरा खुश हो रही थी कभी।
करूँ क्या इस उम्र में अब राह नही सूझती।।

जिसकी आरज़ू में ज़िन्दगी गुजार दी मैंने।
उसकी निगाह से मेरी जरूरत नही सूझती।।

जिसके लिए तमाम तकलीफों से जूझी मैं।
दुनिया में खोकर मेरी झलक नही सूझती।।

बेईमान हो गया 'उपदेश' जाने क्या पाकर।
नर्म लहजे के ज़माने में फर्ज़ नही सूझती।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
3 महीने पहले
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