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ज्वारभाटा

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज्वार-भाटा हमारी रगों में उठ रहा जैसे।
        
                                                    
                            
समुन्द्र का फैलाव जिस्म में बढ़ रहा जैसे।।

हाल-ए-दिल की बात पूछते क्यों मुझसे।
जितना छुपाता उतना ही खुल रहा जैसे।।

रात में ख्वाब इधर से उधर उधर से इधर।
दिन निकलने से पहले वो सता रहा जैसे।।

आजकल विचरते देखे गए करीबी रिश्ते।
बेवजह ही मिल्कियत को जता रहा जैसे।।

उनकी औकात की बात बेफजूल लगती।
मुझसे रिश्ता ही उनका अटपटा रहा जैसे।।

जिसकी बाहों में पनाह माँगी थी 'उपदेश'।
वो किसी और बाहों में छटपटा रहा जैसे।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
3 महीने पहले
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