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जाना था चले जाते दौलत छोड़कर

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बेवक्त तुम गए, मुझे अंतर्मन तक तोड़कर।
        
                                                    
                            
जाना ही था तो चले जाते दौलत छोड़कर।।

हर बात मानती रही हर जगह निर्विरोध सी।
प्रेम बन्धन से सुसज्जित लोभ को छोड़कर।।

तुम ठहरे सपनों के सौदागर मेरी दुनिया के।
और हम विश्वास में तड़प रहे तुम्हें छोड़कर।।

किसको पता था यों अचानक चले जाओगे।
मुझे ऐसे तोड़कर यों चलती आँधी में छोड़कर।।

बस चुप रही जब तुमने छोड़े प्राण 'उपदेश'।
सन्न रही आँखों जैसी झील के आँसू छोड़कर।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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