तहजीब की बाते सुन लेते सिर झुका कर।
तल्खी रहती दिल में यों हिसाब मिला कर।।
अब दुनिया की हकीकत से वास्ता न रखा।
फिर तकलीफ़ क्यों आ जाती मुस्करा कर।।
जो मिला वो फरेबी निकला गुनाह मेरा होगा।
कभी रखी थी निशानी किताब में दबा कर।।
तेरी यादों के सहारे काटे जा रही हूँ जिन्दगी।
लिखने को लिख सकती सारे राज खोल कर।।
महक अच्छी लगती तुम करीब रहो 'उपदेश'।
मेरी महक के साथ ही कुछ वक्त गुजारा कर।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'