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दीवार सी तन गई बेरहमी खल रही

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            किसी के सहारे जिन्दगी चल रही।
        
                                                    
                            
अन्दर में भाव बेभाव से बदल रही।।

जब भी आती उसकी याद की खुशबू।
तरबतर करने की क्षमता अचल रही।।

नामंजूर उसका फैसला जब से किया।
दीवार सी तन गई बेरहमी खल रही।।

उसे समझ पाने की हिम्मत मुझमें नही।
उन्नतिशील में बंदिशों की खलल रही।।

बन रहा कुछ राहत का जरिया 'उपदेश'।
फरिश्तों की मनसा आज भी अटल रही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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