तेरे बारे में सोचते चाय ठंडी हो गई जैसे।
मसला आज भी मंझधार में तैर रहा जैसे।।
किरदार मेरा वक्त की पाबंदियों में उलझा।
तुमसे दूर रहकर मनाने की सोच रहा जैसे।।
रातों को स्याही से बचाना मुश्किल होगा।
यादों को रबर घिस घिस के मिटा रहा जैसे।।
सच बोलूंगा तो दोनों की बदनामी का डर।
हर हाल में ज़माने को झूठ परोस रहा जैसे।।
सब को वज़ह बता भी नही सकता 'उपदेश'।
प्रेम की बात और रही गुफ़्तगू चल रहा जैसे।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद