शहर बदलने की जरूरत रोज़गार लाया।
सारा ज़माना एक तरफ मुझे ढूँढ न पाया।।
दामन से चिपके लोग खुद-ब-खुद छूट गए।
हकीकत में सफ़र करते हुए मजा न आया।।
मेरी ग़ज़ल पसन्द आएगी जरूरतमंद को।
बे-जरूरत शख्स का कल का वक्त न आया।।
मेरी शख्सियत का प्रमाण मेरा रोज़गार रहा।
नाकाबिल समझने वालों का तख्त न आया।।
बस एक कमी बेवजह ही खल रही 'उपदेश'।
बीती मोहब्बत को मुझपर तरस ही न आया।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'