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बात बिगडने लगी

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब से कलम चलने लगी, तब से अकड़ बैठे।
        
                                                    
                            
बात बिगडने लगी, उस वजह से झगड़ बैठे।
चेस की तरह चालें, वो शह-मात से बेखबर।
जाने किसके दबाव में, चाल को पकड़ बैठे।
वक्त की पहचान नही, बद्तमीज़ी बेइन्तहा।
इम्तिहान की घडी में, रिश्तों को रगड़ बैठे।
शायद वाकिफ नही थे, झगड़े के अंजाम से।
इसलिए 'उपदेश' से, अनजाने में चढ़ बैठे।

उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद

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4 वर्ष पहले
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