विज्ञापन

अँधेरे से बचना

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहना अगर मंजूर नही तो हरगिज पाँव नही धरना।
        
                                                    
                            
दरिया रूपी रही मोहब्बत इसमें पड़कर होगा बहना।।

सूरज के उगने से चढ़ने तक गम मिटने का दौर चला।
जैसे ही रुख शाम का लगता हर ओर अँधेरे से बचना।।

लफ्जों को जिंदा कर देती भोली सूरत वाली प्रियतमा।
इश्क मोहब्बत वाली नदियों की तेज रवानी से बचना।।

वैसे तो धरती की मोटी सतह ठण्डी रहती 'उपदेश'।
क्या कुछ फल फूल रहा यहाँ फिर भी लावा से बचना।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all