मौन हो जाऊँ यदि आज मैं,
एक व्यथा नहीं कह पाऊँगी।
एक पंछी की वाणी को मैं,
स्वर नहीं दे पाऊँगी।
मौन उसने साध लिया,
अपने पंखों को बाँध लिया।
अभिव्यक्ति उसकी अधूरी है,
जो वह कर सकी न पूरी है।
प्रतीक्षा बन गई अँधियार,
एक प्रश्न था जिसका आधार।
प्रतीक्षा में बँधा था
उसका हर एक विचार,
कोई पूछ ले उससे—
“क्या प्रिय? क्या अप्रिय भार?”
वह सोचे—
कब होगा वह निश्छल संवाद,
कब कोई समझेगा
उसके मन की फरियाद।
पर प्रश्न न आया,
न टूटी वह दीवार,
और बढ़ता गया
उसके मन में अँधियार।
भाव बिखर गए,
न मिला संग-नाद,
और प्रतीक्षा में ही
खो गया उसका संवाद…
इतनी लंबी प्रतीक्षा…
कि भूल गई पहचान,
क्या रुचिकर था उसको,
क्या देता था अपमान।