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शोर ए सियासत

umesh shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शोर ए सियासत में दब गए
        
                                                    
                            
आम आदमी के जज़्बात

जनता को विकल्प नहीं सूझ
रहा के कैसे संभलेंगे हालात

जन जन है सहमा हुआ देख
कोरोना का विकट विस्तार

पर आत्ममुग्ध नेता. अफ़सर
नित कर रहे हैं दांवे धुआंधार

व्यवस्था में लगे लोग भी
कर रहे मनमाना व्यवहार

आम आदमी सिसक रहा उसे
है नियति से शिकवा अपार


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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Sanjai kumar

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