कलयुग का विनाश रूपी छाया से मंडरा रहा है अंधियारा,
दोस्ती-भाई-रिश्तेदार कोई न होगा कलयुग में सहारा।
ये दुनिया मतलब की, मतलब का है संसार,
अब अंधियारे में यूं सबको समा जाना,
न होगा उजियारा न होगा सहारा।
लोभ-मोह में फंसा है मानव सारा,
सत्य की राह से भटक रहा है किनारा।
अंत में न प्रेम रहेगा न प्यार,
भाई-भाई लड़ेंगे, भूलेंगे धर्म-संस्कार।