नजरे कहां ले जाऊं कोई तुझसा नहीं
अपना किसे कहुँ कोई तुझसा नहीं
लाख होंगे दर्द जमाने में मगर
बात मरहम पे आई तो कोई तुझसा नहीं
रोज मरता हु तो दफना भी दूं खुदको मगर
राख से फूल उठाने वाला कोई तुझसा नहीं
तारो को शिकायत है अब हम बात नहीं करते
कैसे करलू बात कोई तुझसा नहीं
जमाने से लड़ जाता तेरे लिए
तेरे सामने झुक गया कोई तुझसा नहीं
भूलने पे आऊं तो खुद को भूल जाऊं मगर
मं तुझमें खोया हु कोई तुझसा नहीं