एक घाट है गाँव बगल में मेरे
एक बस्ती में बहता झरना है
घाट के ऊपर बच्चे नहाते
झरने से पानी भरना... है
एक बाग है कच्ची केरी का
काका बैठे रखवारी पे
तोड़के बच्चे घर को भागे
पीछे छुपने महतारी के
कितने मटके कुम्हार के फोड़े
कितनी हम वो डांट खाये
मंदिर में सब मन्नत मांगे
वहां से भी हम पैसे लाए
सबके घर ही कच्चे थे
हम कुछ 16 17. बच्चे थे
आपस में हम लड़ते फिरते
फ़िर भी दीन वो अच्छे थे
कभी कभी फिर नानी आती
खुशियों का संसार लाती
माँ बैठे फिर आँखे भरके
घर का सारा हाल बताती
बारिश बरसे मिट्टी महके
बारिश लाये मोर की चिठ्ठी
बंद आँखों से स्वाद लिया तो
मिट्टी है शकर से मीठी