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कबर में

Tushar Sirra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इक रोज तेरे आंसू निकले
        
                                                    
                            
खुदा करे वो मेरी कब्र पर निकले
मं तड़प रहा हु इसी आस में
बूँद गिरे की पोधा निकले

म पोधा बनना चाहता हूं
फूल बनके खिलना चाहता हूँ
बनके फूल तेरे बालो मैं बैठू
मं तेरी ख़ूबसूरती की वजह बनना चाहता हूँ

ये सफर कोई आम नहीं होगा
बाजार में मोल लगेगा मेरा
तमाशा भी होगा
डर ये भी कोई मय्यत में ना ले जाए
जहां से निकला हु वही ना ले आये
मं चाहता खरीदने तू आये मुझे
मेरा मोल करे अपनी आँखों में सजाये

वो पल केसा होगा
तू मेरा दाम देगा
जो जीते जी नहीं हुआ
वो मरे बाद होगा
कहेगा तू कि मेने रकम दी है
अब ये मेरा है ओर मेरे पास रहेगा

देखते ही देखते तुम
आइने के सामने ले आओगी
ख़ुद को ओर मुझे एक साथ पाओगी
मं हू जो महक उठूंगा उसी वक्त
तुम हो कि मेरी खुशबू में झूम जाओगी

आँख बंद करके तुम मुझे महसूस करोगे
मं आवाज दूंगा तुम्हें तुम सुन भी नहीं पाओगी
सुनाना मं चाहता भी नहीं
याद दिलाना म चाहता भी नहीं
याद आके रुला दूँगा मं तुम्हें
फिर से एक बार खो दूंगा मैं तुम्हें
बड़ी मन्नतों के बाद मिलेगा वो दीन
उसके बाद भुला दूंगा मं तुम्हें

एक दीन की ही तो मिलेगी जिंदगी
फूल भला कितना जिंदा रहता है
छोड़ो इन बातों को तुम भी
कबर में ये तुषार जाने क्या क्या कहता है
2 महीने पहले
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