निगाहें सुर्ख़ रहती हैं, जिगर में बे-क़रारी है
मुझे कहते हैं चारा-गर, तू मर्ज़-ए-दिल की मारी है
दवाएँ भी नहीं लगती, दुआएँ भी नहीं लगती
कहा इक पीर ने मुझसे, ये उल्फ़त की ख़ुमारी है
— त्रिशिका धरा