जटा गंगा, गले विषधर, सुधाकर भाल पर धर कर
उमा के संग सावन में धरा पर आ गए शंकर
कहीं शिव भस्म से सजते, कहीं पुष्पों से सजते हैं
चहुँदिस बज रहे डमरू, भजन भी हो रहे घर-घर
— त्रिशिका धरा