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धर्म के संघर्ष

tribhuvanesh bhardwaj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धर्म में कट्टरवाद
        
                                                    
                            
खेमों में बंटी अर्चनाएं
प्रार्थनाओं में संघर्ष
दुआओं में टकराव
वो कहते हैं किसे पूजते हो
जो परमात्मा नहीं उस पर रीझते हो
उसका पता न ठिकाना न कोई मजहब
उसे क्यों आस्थाओं का कोष देते हो
फिर एक फतवा फिर एक फरमान
नहीं पूजेगा कोई उस फ़क़ीर को
ये कैसा धर्म है
जिसमे आस्थाओं का सम्मान नहीं
आज आदमी धर्म को ओढ़ता बिछाता नहीं
वो चाहता है थोड़ी शांति थोडा आसरा
और एक एकांत खुद आंसू निचोड़ने के लिए
आदमी को धर्मो ने अब तक तोडा ही है
मैं जहाँ शीश झुकाऊं
वो जगह मंदिर ही हो
क्या ये जरुरी है
मंदिर मस्जिद गुरु द्वारे और चर्चों में
कैद हो सकती नहीं आस्थाएँ
वो जहाँ ठहरती है
वो जगह शक्ति पीठ हो जाती है
चाहे वो शबरी की कुटिया हो
या किसी फ़क़ीर की धुनी भूमि

- त्रिभुवनेश भारद्वाज "शिवांश"
3 वर्ष पहले
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