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अधूरा इश्क़

Tikam Solanki - Aryaman

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अधूरा था, अधूरा है,
        
                                                    
                            
अधूरा ही रहेगा,
इश्क़ मेरा मुकम्मल
कहाँ होगा।

चल पड़ा हूँ अब उस राह पर,
जहाँ मंज़िलों का कोई हिसाब नहीं,
कई मील पीछे छूट चुका हूँ,
अब लौट आना मेरे इख़्तियार में कहाँ होगा।

न जाने कितनी शबें
तन्हाई के नाम कर दीं मैंने,
न जाने कितनी आरज़ूएँ
दिल में ही दफ़्न कर दीं मैंने।
गुज़ार दी अपनी हसरतें,
गुज़ार दी अपनी जवानी,
और ख़ुद से भी छुपा ली
एक अधूरी-सी कहानी।

रुख़्सत हुए उसे
एक ज़माना गुज़र गया,
मगर दिल है कि आज भी
उसका तसव्वुर कर जाता है।

वो दौर ही कुछ और था—
वो दौर मोहब्बत का था,
हर गली, हर कूचा
उसकी चाहत का था।

सीने में उठता दर्द भी
अजब-सा सुकून देता था,
उसकी याद का हर ज़ख़्म
जैसे जीने का जुनून देता था।

उसका अक्स अब भी
मेरी यादों के आईने में ठहरा है,
वक़्त गुज़र गया मगर
वो तसव्वुर आज भी मेरा है।

मगर अब वो दौर कहाँ,
अब वो जुनून कहाँ,
अब वो बेख़ुदी कहाँ,
अब वो जवानी कहाँ।

जो इश्क़ कभी
मेरी रूह की आवाज़ हुआ करता था,
आज वही इश्क़
एक ख़ामोश दास्तान है।

शायद वक़्त ने उसे
भुला देने का हुनर सिखा दिया,
मगर दिल ने आज तक
उसे भुलाना नहीं सीखा।

अधूरा था, अधूरा है,
अधूरा ही रहेगा—
इश्क़ मेरा मुकम्मल कहाँ होगा।
2 महीने पहले
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