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बेशरम का फूल

THAKUR VARSHA

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं हूँ एक कोमल धवल फूल ,
        
                                                    
                            
हर हाल में जीना है .मेरा उसूल ,
जाने क्या ख़ता हुई मुझसे ,
जो ज़माना कहता है .मुझे बेशरम का फूल ।

भयंकर आंधी आए या तूफान ,
घनघोर बरसे बादल,
नदी नाले में आए उफान ,
सबका मैं .सदा झुककर करता हूँ .सम्मान ।
क्या यही है मेरा कसूर ?
जो ज़माना कहता है मुझे बेशरम का फूल ।

बंजर धरती में मैं रम जाता हूँ ,
सूनसान राह के तट पर बस ज़ाता हू ।
अनजाने राही को राह दिखाता हूँ ।
मुस्कुरा कर करता सदैव सबका सम्मान ,
क्या यही है मेरा कुसूर ?
जो ज़माना कहता है मुझे बेशरम का फूल ।

न मुझे खाद चाहिए .न ज्यादा पानी ,
न देख भाल .न कोई जतन ,
मुझे तो चाहिए अस्तित्व के लिए ,
बस थोड़ा सा चमन (ज़मीन) ।
मेरी ज़रूरत है कम .
इसलिए मेरे ज़मीर में है दम .
क्या यही है मेरा कुसूर ,
जो ज़माना कहता है .मुझे बेशरम का फूल ।

मौसम का डर मुझे कभी नहीँ सताता,
हर मौसम का मैं लुफ़्त उठाता ।
सावन के रिमझिम में मैं,
मदमस्त पवन के झोंको के संग,
झूमता ,नाचता, ख़ुशी के गीत गाता ।

शिशिर की शीतलता मुझे बहुत भाती ,
जैसे जैसे ठिठुरन बढ़ती,
मेरा रंग और निखरता जाता ।
गर्मी में जब बरसते अंगारे,
मै सीना तान बहुत इठलाता,
सूरज से आँख मिलाता ,
हँसता और मुस्कुराता।

पतझड़ में भी नही कुम्हलाता।
हर हाल में खुश रहना है
मेरा उसूल,
क्या यही है मेरा क़ुसूर,
जो जमाना कहता है ,
मुझे बेशरम का फूल ।
-वर्षा ठाकुर
 
3 महीने पहले
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