मौन हूँ, इसका अर्थ ये नहीं कि
मेंरे पास शब्द नहीं ,
धैर्य की छाया में मेरा प्रत्येक
संकल्प संचित है।
जो मेरी निस्तब्धता(खामोशी) को,
दुर्बलता का नामते हैं,
वे समय के न्याय से अनभिज्ञ
अपने ही भ्रम में जीते हैं।
मैने मुश्किलो से भरे पथ पर भी ,
मुस्काकर कदम बढ़ाया है।
हर उत्तर शब्दों से देना
आवश्यक नहीं होता,
चरित्र का तेज़ स्वयं ही
सत्य का उद्घोषक होता है।
पर्वत क्या अपनी ऊंचाई का
प्रतिदिन बखान करते है?
सागर कब अपनी गहराई का
प्रमाण सभी को देते है !
सूर्य कभी अपने प्रकाश का
परिचय लेकर नहीं निकलता है
उसका उदय होना ही
अँधकार का पथ बदलता है।
आज यदि मेरी नज़रें झुकी हैं,
तो यह विनय का मान है!
अन्याय के सम्मुख उठ जाएँ,
यही मेरा स्वाभिमान है!
इसलिए मैं व्यर्थ विवादों में ,
अपना समय नहीं खोती हूं !
जो सत्य के पथ पर चलते है,
वह स्वयं ही उत्तर होते हैं ।
-दीपा