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गीतिका : धूप सा खिलना तिरा...

Tejpal Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धूप सा खिलना तिरा अच्छा लगा,
        
                                                    
                            
ख्वाब में मिलना तिरा अच्छा लगा।

यहां हर-पहर आवारगी का दौर है,
चाँद पर रुकना तिरा अच्छा लगा।

जानता हूँ ज़िंदगी अज़ाब है मगर,
जीस्त से लड़ना तिरा अच्छा लगा।

किसने कब उंगली उठाई स्वयं पर,
स्वयं पर हँसना तिरा अच्छा लगा।

राह दिल की ‘तेज’ गो अति तंग है,
पर बारहा चलना तिरा अच्छा लगा

- तेजपाल सिंह 'तेज'

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5 वर्ष पहले
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