‘निर्लज्जता’
जब उठा सवाल मेरी लज्जा पर,
क्यों तुम बनते हो निर्लज्ज?
न हो परिपक्व कवि जब,
फिर क्यों शब्द बुनते रहते हो।
सुन कंटक सम वचनों को,
दिया प्रत्युत्तर मेरी कलम ने,
कहा उसने मधुर स्मित संग,
हाँ, मैं हूँ निर्लज्ज शब्द गढ़ने में।
मैं तो हूँ स्रोत केवल भावों का,
वो कागज़ से कहती है उन्हें,
नित तंज कसने वालों को भी,
निर्मल शब्दों से नमन करती है।
मैं लज्जाता हूँ मनोभाव कहने में,
वो निर्लज्जता मुझको देती है,
बन सारथी मेरे भावों के रथ का,
काव्य पथ पर उन्हें ले जाती है।