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अंतर की राह

Swapna Joshi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक ऋतु के समाप्ति के बाद का अवकाश काल,
        
                                                    
                            
विचित्र वेदना और खालीपन से भरा हुआ है।
मेरे वीरान अंतर्मन में स्थित उजाड़ उद्यान के,
सूखे पतझड़ के पत्तों को उड़ाती, शीत की पवन;
उन गहरे गढ़े पदचिन्हों की धूल उड़ाती हैं।
जैसे किसी ने दादाजी के पुराने बक्से पर से,
धूल झाड़ कर, खोल बैठा गूढ़ गहन घाव।
जो याद दिलाते दूर गगनचर दुनिया पार से आते,
पंछियों संग उस शून्य–चित्त से राजसी अंतर की।
जिसके पदचिन्हों ने नवाजा है मेरे उद्यान के कोमल राजमार्ग –जो बिछा रहता है सुंदर फूलों की
पंखुड़ियों से, सुनहरे पीले पत्तों से नित दिन;
शायद इसी राह में, शायद इसी ताक में की,
किसी दिन, किसी समय, कभी तो दस्तक देगा,
फिर एक बार मेरे हृदय–द्वार से होकर आन पहुंचेगा;
अंतर मेरे मन–भवन स्थित उसके अपने उद्यान।
8 महीने पहले
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Aditya Mishra

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