ग़रीबी गर हटा डालें तो धनवानो का क्या होगा
अधर बिखरी रहा करती वो मुस्कानों का क्या होगा
नहीं बाजे कहीं पायल, नहीं चमकी कहीं बिजली
भरी महफिल में सन्नाटा , बियाबानों का क्या होगा
उसे मालूम है प्यासा कहाँ ,ज्यादा मिलेगा अब
अगर रिन्दों की हड़तालें, तो मयखानों का क्या होगा
अभी लौटा है बारिश का महीना फिर गया जैसा
बड़े जोरों से जो बरसा तो दरबानों का क्या होगा
बहुत सीलन है कमरे में ये कागज सब रिसाए हैं
मुझे डर है मिरे अशआर - अफ्सानो का क्या होगा
बला की तेज गर्मी है यही मौसम भी शादी का
यहाँ तिरपाल में जुम्हाते मेहमानों का क्या होगा
इसी खंडहर में गुम लम्हे मिरे क्या लौट आयंगे
यहीं जंगल बनाए मेरे वीरानों का क्या होगा
लगा के आग देखोगे तमाशा तुम अभी नादा
यूँ ही नफरत जो फैली गर सनमखानो का क्या होगा
चलो बाजी नई खेलें नया है साल का तेवर
गरा सौदा खरीदो वरना दूकानों का क्या होगा
नतीजा सामने देखो सभी अपनों घिरे मिलते
अगर हों सब यहाँ अपने तो बेगानों का क्या होगा
-सुशील यादव दुर्ग