शायर: सुशील कुमार 'बाबरा'
ज़िंदगी से न कोई ख़ास शिकायत रखी,
हमने हर हाल में जीने की आदत रखी।
दूर उनसे रहे जो दिल को दुखाते ही रहे,
अपनी तन्हाई में अपनी ही हिफ़ाज़त रखी।
राह के पत्थरों से भी मुस्कुराकर मिले,
दिल में न कोई अदावत, न रंजिश रखी।
जो गुज़रना था सो गुज़रा, उसे भूल गए,
आने वाले के लिए दिल में उम्मीद रखी।
शहर-ए-फ़रेब में सच बोलना आसाँ न था,
फिर भी होंठों पे सदा हमनें सच्चाई रखी।
जब भी टूटे, तो बड़े सब्र से ख़ुद को जोड़ा,
काँच के दिल की भी हमने ही हिफ़ाज़त रखी।
कोई समझे न समझे, हमें कोई ग़म नहीं,
अपनी नीयत में हमेशा ही सफ़ाई रखी।
रंज-ओ-ग़म के जो समंदर भी मिले राहों में,
हम वो दरिया हैं जिसने कि रवानी रखी।
माँगने हम कभी गै़रों के दर पर न गए,
अपनी ख़ुद्दारी की हर मोड़ पे इज़्ज़त रखी।
मुस्कुराते रहे हम ज़ख़्म छुपा कर अपने,
लोगों के सामने हँसने की रवायत रखी।
तू अपनी ही धुन में सदा मस्त रह 'बाबरा',
सबके हक़ में हमेशा मैंने दुआ ही रखी।
-सुशील कुमार 'बाबरा'